साज……

वो सपने ही क्या जिनमे चाह ना हो,

वो अपने ही क्या जिनमे चाह ना हो,

वो मंजिल ही क्या जिनमे राह ना हो,

वो साहिल ही क्या जिनमे लहरे ना हो,

वो बोल ही क्या जिनमे शब्द ना हो,

और वो शब्द ही क्या जिनमे साज ना हो ।।

वो वक्त ही क्या जो रुकना जानता हो,

वो हिम्मत ही क्या जो थखना जानती हो,

वो ख्वाहिशे ही क्या जो झुकना जानती हो,

वो साथ ही क्या जो टूटना जानता हो,

वो बोल ही क्या जो चुप रहना जानते हो,

और वो शब्द ही क्या जो बिना साज के बजते हो ।।

वो सुरुआत ही क्या जिसे अन्त की परवाह हो,

वो कर्म ही क्या जिसे अंजाम की परवाह हो,

वो रास्ते ही क्या जिसे खो जाने की परवाह हो,

वो जहाज ही क्या जिसे लहरों की परवाह हो,

वो बोल ही क्या जिसे सूनने वालो की परवाह हो,

और वो शब्द ही क्या जिसे सही गलत की परवाह हो।

वो जिन्दगी ही क्या जिसमे हार ना हो,

वो बंदगी ही क्या जिसमे स्वीकार ना हो,

वो होंसले ही क्या जिसमे उड़ान ना हो,

वो इम्तेहान ही क्या जिसमे पार ना हो,

वो बोल ही क्या जिसमे शब्द ना हो,

और वो शब्द ही क्या जिसमे साज ना हो।।

लौट आती हु……..

वक्त ने मुझे कुछ व्यस्त सा बना दिया है,

पर फिर भी लौट आती हु मैं अपने सबर में,

सपनो ने मुझे कुछ ऊँचा उड़ना सीखा दिया है,

पर फिर भी लौट आती हूँ मैं अपने धरातल में,

ज़िन्दगी की रफ़्तार ने मुझे भागना सीखा दिया है,

पर फिर भी लौट आती हूँ मैं अपने घर में,

नये ज़माने ने नए तरीके से जीना सीखा दिया है,

पर फिर भी लौट आती हूं मैं अपनी कलम में ।।।

उम्र ने मुझे वक्त के साथ समझदार बना दिया है,

पर फिर भी लौट आती हूं मैं अपने बचपन में,

अनुभवों ने मुझे रिश्ते जोड़ने,तोड़ने सीखा दिया है,

पर फिर भी लौट आती हु मैं कुछ अनजाने रिश्तो में,

हालातों ने मुझे सही रास्तो को जानना सीखा दिया है,

पर फिर भी लौट आती हु मैं अनजानी सी डगर में,

टूटे विस्वास ने मुझे चुप रहना सीखा दिया है,

पर फिर भी लौट आती हूं मैं अपने कुछ शब्दों में।।।

समजदारी ने मुझे सही फैसले लेना सीखा दिया है,

पर फिर भी लौट आती हूं मैं अपनी कुछ गलतियों में,

कुछ रिश्तो ने मुझे अकेला रहना सीखा दिया है,

पर फिर भी लौट आती हूं मैं इस अनजानी दुनिया में,

कुछ आंसुओ ने मुझे पत्थर सा बना दिया है,

पर फिर भी लौट आती हूं मैं बेहिसाब खुशियो में,

इस समय की धार ने मुझे मशीन बना दिया है,

पर फिर भी लौट आती हूं मैं अपनी डायरी में।।।

मासूमियत……

बहुत कीमती है तेरी ये मासूमियत,

आज की दिखावे की ज़िन्दगी में,

बहुत मुश्किल से मिलती है ये मासूमियत,

जहा दिल पत्थर बन गए है,

और मन नफरतो से भर गए है,

वहाँ बहुत जरुरी है तेरी ये मासूमियत,

बहुत कीमती है तेरी ये मासूमियत।

जहाँ वक्त भाग रहा है एक अनजानी दोड़ में,

जहाँ चेहरों ने पहन लिए मुकोटे कई,

वहाँ तेरी असली पहचान है तेरी ये मासूमियत,

जहाँ कोई जख्मो पे मरहम लगाने वाला नहीं,

घावों को नोचने वाला है हर कोई,

वहाँ एक रहमत है तेरी ये मासूमियत,

बहुत कीमती है तेरी ये मासूमियत।

ये कोई कमजोरी नहीं तेरी,

ये तो खुदा की एक खूबसूरत नुमाइश है,

बहुत ही खूबसूरत है तेरी ये मासूमियत,

बहुत कीमती है तेरी ये मासूमियत।

मत डर तू इसके खिलखिलाने से,

ये तो हिम्मत है तेरी ये मासूमियत,

वक्त बदल जायेगा वक्त के साथ,

लोग बदल जायेंगे वक्त के साथ,

पहचान भी बदल जायेगी लोगो के साथ,

बस हमेसा साथ रहेगी तो तेरी ये मासूमियत,

बहुत कीमती है तेरी ये मासूमियत।

जीने दे…..

खोल दे अपनी बाहें तू,

दुनियां को खुद से मिलने दे,

आजाद कर इन शब्दों को तू,

आसमान में इन्हे बिखरने दे,

खोल दे अपनी बंदिशें तू,

चिकने धरातल पे इन्हे फिसलने दे,

चमकने दे अपनी आँखों को तू,

सपनो की दुनिया में इन्हे खोने दे,

भूल जा मौत का ख़ौफ़ तू,

इस ज़िन्दगी को ज़िन्दगी सा जीने दे ।।

गिरने दे इस धुप को चेहरे पे तू,

एक सूरज को दूसरे सूरज से मिलने दे,

खो जाने दे खुद को चांदनी में तू,

सितारों के साथ खुद को चमकने दे,

बह जाने दे इस वक्त को तू,

इस बहती नदी के साथ खुद को बहने दे,

खिलने दे तेरी मुस्कान को तू,

खिलते फूलो से इसे मिलने दे,

भूल जा मौत का ख़ौफ़ तू,

इस ज़िन्दगी को ज़िन्दगी सा जीने दे ।।

भूल जा जो बीत गया वो सब तू,

नये लम्हो को ज़िन्दगी में आने दे,

जो गया वो साथ उसे जाने दे तू,

नये साथ को तेरे साथ चलने दे,

जो नहीं था तेरा उसे खुशि से जाने दे तू,

जो आना है मन को उसका स्वागत करने दे,

आंसुओ को अब मत संभाल तू,

इन्हे मोती सा बह जाने दे,

भूल जा मौत का ख़ौफ़ तू,

इस ज़िन्दगी को ज़िन्दगी सा जीने दे ।।

Kahani teri meri si……….11

ये शुरुआती दिन थे, पिया के कॉलेज के, 2 साल बहुत प्रेशर में पढ़ने के बाद थोड़े ठीक दिन आये थे उसकी जिन्दगी में। और पढाई का प्रेशर जाने के साथ साथ 2 साल पहले खोई दादागिरी भी वापस लौटने लगी थी। देखने में बहुत ही सीधी लगती थी पिया, कोई भी देखकर विस्वास नहीं कर पाए की एक सीधे से चेहरे के पीछे एक डॉन टाइप लड़की जीती है, जिसे सही मायनों में इस समाज के द्वारा तय लड़की का मीनिंग भी समझ नहीं आता था।

हालाँकि कॉलेज में वो यही सोचकर आयी थी, या कहे समझाकर भेजी गयी थी की, लड़कियों के बीच रहकर लड़की जैसे जीना सीख लो, थी तो वो भी ईसी कोसिस में, और इसीलिए लड़कियों के ग्रुप में खड़ी बाते कर रही थी, या फिर शायद बात करने की कोसिस कर रही थी, क्योकि बात करना कहा आता था उसे, आता था तो बस फ़ोकट का ज्ञान बाटना जो कोई नहीं सुनता था।

वैसे अभी उसे गुस्सा आ रहा था, क्योकि ये पहली गेट टुगेटर थी , और किसी भी आरंजमेंट के लिए उनसे नहीं पूछा गया था। लड़को ने सब अपने हिसाब से तय कर लिया था, और ये बात उसे कैसे मंजूर हो, बस बोल दिया गया था यहाँ आना है। समझ नहीं आ रहा था कुछ भी उसे, ये कैसी अजीब जगह है, जहा खुद को गेट टुगेटर करनी है, और हमसे कुछ पूछा ही नहीं गया, कैसे सब खुद तय कर लिया , क्या हम क्लास में नहीं है। बस यही उठा पटक चल रही थी उसके छोटे से दिमाग में। क्योकि पिया ने कभी इस तरह आर्डर मानने सीखे ही नहीं थे, या कहे कभी फोकट में कुछ लेना उसे आता ही नहीं था, बिना अपनी टांग अड़ाए तो उसकी ज़िन्दगी में एक भी काम पूरा न हो।

ऐसी उठा पटक में एक नेतागिरी वाली आवाज सुनी उसने, कल 2 बजे रेस्टोरेंट में मिल रहे है अपने सब लोग, सारे अरेंजमेंट हो गए है, बस 2 बजे पहुच जाना तुम सभी लोग, और हां कोई टेन्सन वाली बात नहीं है, तुम लोग बिलकुल सेफ हो, कोई कमेंट या ऐसी वैसी हरकत नहीं करेगा।

किसकी हिम्मत है जो हम पे कमेंट करेगा। बस एक लाइन , और एक लाइन में ही सब निपटा दिया पिया ने, यही तो खासियत थी पिया की सारे हिसाब तुरंत निपटा दो बस वही के वही। खामोस हो गयी थी वो इतना बोलकर, क्योकि जानती थी इतना जवाब काफी है।

अब नेतागिरी वाली आवाज इतनी कंफ्यूज हो गयी थी, की वो क्या बोले, इस बात का कोई जवाब नहीं था उसके पास, या शायद उसने कभी सोचा ही नहीं था कि इस सुनने को भी मिल सकता है क्या। ये आवाज अवि की थी।

दोनों आवाजे ही नहीं जानती थी की कभी उनके बीच इतने पल शेयर होंगे। ये कॉलेज में पहली मुलाकात थी पिया और अवि की। दोनों ही नहीं जानते थे की कभी एक दूसरे की इन्ही आवाजो को झेलना पड़ेगा, और ये आवाज आज भी नहीं बदली , अवि की वही नेतागिरी और पिया की वही डोनगिरी, अभी भी जारी है, और बदलेंगे भी कैसे, आखिर बेस्ट फ्रेंड जो है दोनों……..

तस्वीर…….

कल एक तस्वीर देखी मैंने,

उमंगों से भरी दो आँखे देखी मैंने,

जब ढूंढ रही थी तस्वीर में खूबसूरती,

छालो से जले हुए पाव देखे मैंने।

कल एक तस्वीर देखी मैंने,

प्यार से भरी दो आँखे देखी,

जब ढूंढ रही थी तस्वीर से लगाव,

कई टुकड़ो में बंटे दिल को देखा मैंने।

कल एक तस्वीर देखी मैंने,

उत्साह से बाहों को फैलाये देखा मैंने,

जब ढूंढ रही थी तस्वीर में साथ,

हाथो में कई घावों के निशान देखे मैंने।

कल एक तस्वीर देखी मैंने,

सम्मान से उठे एक सर को देखा मैंने,

जब ढूंढ रही थी तस्वीर में जूनून,

मन में जल रही आग को देखा मैंने।

कल एक तस्वीर देखी मैंने,

होंठो पे एक प्यारी सी मुस्कान देखी मैंने,

जब ढूंढ रही थी तस्वीर में वजह,

आँखों में सपनो का आसमान देखा मैंने।

कल एक तस्वीर देखी मैंने।

खो गयी हु मैं…..

बह रही हूँ मैं एक नदी में,

कितने ही पत्थर मेरे सर से टकरा रहे है,

लग रहा है जैसे मेरा सर फट जायेगा इनसे,

पर ये कैसे हो गया,

पत्थरो ने तो मेरे बहने का रास्ता बना दिया,

पत्थरो ने तो खुद मुझे मजबूत पत्थर बना दिया,

अब रास्ते डरकर मुझे जगह दे रहे है,

बह रही हु मैं एक नदी में।

खो गयी हूँ मैं एक रेगिस्तान में,

सूरज ने मुझे झुलसा दिया है,

गर्म मिटटी ने मुझे जला दिया है,

पानी की प्यास मुझे अधमरा कर रही है,

पर ये कैसे हो गया,

झुलसने से तो मेरा रूप निखर आया,

जलने ने तो खुद मुझे सूरज बना दिया,

अब पानी खुद चलकर मेरे पास आ रहा है,

खो गयी हूं मैं एक रेगिस्तान में।

फंस गई हूं मैं एक तूफान में,

आंधिया मेरे होसलो को पस्त कर रही है,

लगातार बारिश ने मेरा शरीर कंपकंपा दिया है,

चमकती बिजली ने मेरे कदमो को बांध दिया है,

पर ये कैसे हो गया,

चमकती बिजली में मैं चलने लगी अंधरो में,

भीगे शरीर ने आंधियो को हरा दिया,

इस तूफान ने तो खुद मुझे ही तूफान बना दिया,

अब मंजिल खुद चलकर मेरे पास आ रही है,

खो गयी हूँ मैं एक तूफान में।…………

Dost…..

जो तुम्हारे गिरते आंसुओ में भी हँसते है,

शायद दोस्त ऐसे ही होते है,

जब गुस्सा आता है वो मजे लेते है,

शायद दोस्त ऐसे ही होते है,

तुम भूखे हो वो तुम्हारा खाना भी खा जाते है,

शायद दोस्त ऐसे ही होते है,

तुम बीमार हो पर हॉस्पिटल के बेड पे वो सोते है,

शायद दोस्त ऐसे ही होते है,

तुम गिरते हो वो हँसते है,

शायद दोस्त ऐसे ही होते है।

पर शायद

जब तुम रोते हो वो तुम्हारे साथ रोते है,

हा दोस्त ऐसे ही होते है,

जब तुम हँसते तो वो साथ हँसते है,

हा दोस्त ऐसे ही होते है।

नाराज हो जाते है वो तुमसे कभी कभी,

पर साथ ना होकर भी साथ होते है,

हां दोस्त ऐसे ही होते है।

खुद सता लेंगे कितना भी तुम्हे,

पर अगर कोई और आया सताने ,

तो औकात उसे उसकी दिखाते है,

हा दोस्त ऐसे ही होते है।

कभी रुकता है ये वक्त,

कभी भागता है ये वक्त,

कभी साथ , कभी नाराजगी,

पर शायद दिल हमेशा साथ रहते है,

हा दोस्त ऐसे ही होते है।

Ziddi zindagi…….8

आज अपने कैरक्टर की परिभासा ढूंढ रही थी वो, जो न जाने किसने लिखी थी, किसने उन्हें तय किया था, और क्यों तय किया था, और ढूंढते हुए बहुत सी परिभासाये मिल गयी थी उसे….

1 अगर वो तेज आवाज में बोलती है तो वो बद्तमीज़ है।

2 अगर वो चुप रहकर सहती है तो वो अबला है और अगर खिलाफ खड़ी हो जाती है तो, उसके संस्कार गलत है।

3 नाभि से 4 इंच ऊँचा ब्लाउज पहन सकती है पर फुल आस्तीन की शर्ट नहीं पहन सकती है, कपडे तो सबसे बड़ा पैरामीटर है उसके कैरक्टर का।

4 अगर वो पढ़ी लिखी नहीं है तो वो बेचारी है, और अगर पढ़ी लिखी है तो घमंडी है।

बस इतना समझना ही काफी था उसके लिए , समझ गयी थी वो ये उसका कैरक्टर कभी नहीं हो सकता है। इन परिभासाओ में सिर्फ चंद शब्द थे, बद्तमीज़, अबला, गलत संस्कार, कपडे, बेचारी, घमंडी बस। ये कैसे पहचान हो सकती है उसकी। कैरक्टर का मतलब तो किसी इंसान की पहचान ही है ना। ऐसा तो उसने कभी नहीं सीखा था कि पहचान ऐसी होती है।

उसने तो कुछ और शब्द सुने थे, शाबास, मेहनती, अच्छी मैनेजमेंट स्किल, समजदार, सैलरी पैकेज, टर्नओवर, बहादुर, खूबसूरत, स्मार्ट, आत्मनिर्भर । शायद ये शब्द उन शब्दों से कही अच्छे है। अब वो इन शब्दों में अपने कैरक्टर की परिभासा ढूंढ रही है और शायद वो सही परिभासा ढूंढ भी लेगी।

कपड़ो का क्या है साहब,

धागे के है ये तो तेरे भी मेरे भी,

इस देह का क्या है साहब,

खून और हड्डियां ही तो है तेरे भी मेरे भी,

रास्तो और मंजिलो का क्या है साहब,

सपने और आजादी ही तो है तेरे भी मेरे भी,

सीमाओं का क्या है साहब,

ज़िन्दगी ही तो है ये तेरे भी मेरे भी,

कैरेक्टर का क्या है साहब,

एक पहचान ही तो है ये तेरी भी मेरी भी।…..

खामखां……

उदासियों को मैंने दीवार में चुनवा दिया,

खामखां जिन्दगी में अनारकली बनकर नाच रही थी।

डर को मैंने कब्र में दफना दिया,

खामखां ज़िन्दगी में मोगेंबो बनकर खुश हो रहा था।

इंतज़ार को मैंने शराब की बोतल में तोड़ दिया,

खामखां ज़िन्दगी में देवदास बनकर घूम रहा था।

तनाव को मैंने पुराने महल भेज दिया,

खामखां ज़िन्दगी में मंजुलिका के घुंघुरू बजा रहा था।

निराशा को मैंने कोको कोला पिला दिया,

खामखां ज़िन्दगी में नागिन बन कर झूम रही थी।

रूठे दिल को मैंने नर्क में भेज दिया,

खामखां ज़िन्दगी में उर्वसी बनकर रूठ रहा था।

अवसाद को मैंने रामगढ़ भेज दिया,

खामखां ज़िन्दगी में गब्बर बनकर थूक रहा था।

गुस्से को मैंने बनारस का पान खिला दिया,

खामखां ज़िन्दगी में डॉन बनकर घूम रहा था।

अकेलेपन को मैंने गोवा भेज दिया,

खामखां ज़िन्दगी में अकेला बोर हो रहा था।

यादो को मैंने “किसी” के पास ही भेज दिया,

खामखां ज़िन्दगी में अब “किसी”से क्या कहना।

फ्रूटी और नदी का किनारा……

यार मैंने नेट पे पढ़ा था , यहाँ वन विहार में बोटिंग होती है पक्की, पूरी तरह से हार जाने पर भी पिया की यही जिदद थी, अवि और सनाया परेशान हो गए थे उससे, 2 दिन से एक ही रट , वन विहार में बोटिंग होती है, और वहां नदी का किनारा भी है, जिसे वो ढूंढ रहे थे, और पिया तो जब से मनाली आयी , बस उसे ही ढूंढ रही थी।

ये सफर मनाली का था, एक सपनो का सफर जो पता नहीं कितने साल पहले देखा था पिया ने। बहुत ही खूबसूरत पहाड़ो में बसा था मनाली। और पहाड़ो में पिया की जान बसती थी। और अगर साथ में ऐसे दोस्त और एडवेंचर मिल जाये तो कहना ही क्या। एक बहुत ही सुन्दर जगह, उत्साह और उमंग से भरी हुई। जगह इंसान को निखरती है और इंसान जगह को जिवंत बना देते है।

देख तूने कल सब जगह ढूंढ लिया था, नहीं मिला न तो अब उसे भूल जा जो तूने पढ़ा था, सनाया ने पिया को समझाते हुए कहा। तो ठीक है किसी से पूछ लेते है, पिया के पास नेक्स्ट अल्टरनेटिव हमेसा रेडी रहता है। क्यों खुद लगकर नहीं ढूंढ सकते है क्या, जब देखो तब किसी से कुछ न कुछ पूछना अवि ने जूंझलाते हुए कहा। तो पूछने में बुराई क्या है, अगर मिल नहीं रहा तो, लोग पूछने और बात करने के लिए ही तो होते है, पिया कहा चुप रहने वालों में से थी। जहाँ अवि को किसी अनजान से पूछना और लोगो से ज्यादा बात करना बिलकुल भी पसंद नहीं था, वही इसके बिलकुल अलग पिया थी, किसी से बी मदद लेना या किसी की मदद करना ये उसे कभी गलत नहीं लगा, और अंजान लोगो से बात करना, बस ये एक ही तो खासियत दी थी भगवन ने उसे, वैसे भी इतना ज्यादा बोलती थी की कोई अंजान ही उसे सुन सकता था, जानने वाले तो थक जाते है सुनते सुनते। और सनाया पता नहीं कैसे झेल पा रही थी दोनों को। कभी बहुत शांत और कभी बहुत खुराफाती, वो अगल थी इस 2 पागलो से।

अरे ये क्या सामने 2 लडकिया फ्रूटी पि रही है, मुझे फ्रूटी पीनी है। पिया अवि के साथ बहस भूल गयी थी। अभी एक बार मॉल रोड पे पहुच जाये फिर ले लेना अवि ने और भी झुंझलाते हुए कहा। एक तो नदी का किनारा नहीं मिल रहा और इसे फ्रूटी चाहिए। पर मुझे अभी फ्रूटी पीनी है जिदद का दूसरा नाम पिया। पता नहीं सनाया कैसे झेल रही थी इन 2 नमूनों को। बिना फ्रूटी के मुझसे चला नहीं जा रहा है। मैं नहीं चलूंगी अब, पहले फ्रूटी। अरे इसे फ्रूटी पिला देते है पहले, सनाया ने कहा, नहीं पहले नदी का किनारा ढूंढेंगे अवि ने जवाब दे दिया। किन 2 जिद्दी लोगो के बिच फस गई थी सनाया।

पेड़ भी फ्रूटी, रोड भी फ्रूटी और अब तो लोग भी फ्रूटी नजर आ रहे है, फ्रूटी चाहिए मुझे, तुम दोनों यही रुको मैं पूछकर आता हूं नदी के किनारे का अवि ने दोनों को एक साइड खड़े करते हुए कहा। एक फ्रूटी और एक नदी का किनारा दोनों पागल ही तो थे। वो वन विहार के गेट के सामने खड़ी थी, जहा अंदर नदी का किनारा था। अवि ने वापस आकर चलो यही पीछे ही है नदी का किनारा। ज्योही अंदर घुसे तीनो, पिया ने तो जैसे जंग जीत ली हो, वहां बोटिंग हो रही थी, फ्रूटी तो भूल गयी वो, देख लो मैंने कहा था न वन विहार में बोटिंग होती है, पर तुम दोनों मेरी बात कहा मानते हो, चलो अब नदी किनारे चलकर बैठते है।

कितना अच्छा लग रहा था वहां, रफ़्तार से बहता पानी और वो भी बिलकुल ठंडा, कुछ घंटे बिताना वहां जैसे जिनदगी को महसूस करने जैसा था। पर अचानक से जैसे कुछ याद आ गया पिया को, मुझे फ्रूटी नहीं पिलाई तुम लोगो ने। यही तो मुश्किल थी पिया की, जो चीज चाहिए वो बस चाहिए कभी भूलती नहीं वो उसे। उठाकर वहां से एक रेस्टोरंट में जाकर बैठ गए तीनो। भैया 2 कॉफ़ी और एक फ्रूटी ले आओ, अवि ने आर्डर देते हुए कहा। सर हमारे पास फ्रूटी नहीं है। गुस्सा कही सारी हदें पार कर रहा था बस अवि को कब पकड़ कर मारे वो जिसकी वजह से उसे फ्रूटी नहीं मिली। चेहरा उतर गया था पिया का, चल मैं दिलाकर लाती हूँ तुजे फ्रूटी, सनाया ने उठते हुए कहा। तू मेरी सच्ची दोस्त है, अब तो लग रहा था जैसे सांसे अटक गई थी पिया की फ्रूटी में। और फाइनली उसे फ्रूटी मिल गयी 6 घंटे बाद ही सही…….

ख्वाब…..

रात को एक अजब ख्वाब देखा मैंने,

एक चिड़िया को चट्टान से बात करते देखा मैंने,

मुझे यहाँ घर बनाना है हर हाल में,

चिड़िया की आँखों में गजब विस्वास देखा मैंने,

चिड़िया की जिद्द को समझा रही थी वो,

उस चट्टान को परेसान होते देखा मैंने,

रात को एक अजब ख्वाब देखा मैंने।

जल जाओगी तुम इस कड़ी धुप में मुझ जैसी,

चट्टान के काले रंग में निखरे रूप को देखा मैंने,

नहीं हूं मैं इतनी नाजुक जितनी दिखती हूँ,

छोटी सी चिड़िया के हट में अरमान देखे मैंने,

रात को एक अजब ख्वाब देखा मैंने।

ये समुद्र का पानी बहा ले जायेगा तुजे अपने साथ,

चट्टान के अकेलेपन का दर्द देखा मैंने,

हौसले मेरे अपने मेरे साथ है समुद्र के खिलाफ,

चिड़िया की आँखों में दृढ विस्वास देखा मैंने,

रात को एक अजब ख्वाब देखा मैंने।

पर क्यों इस अंजान जगह पे बनाना है घर तुजे,

चट्टान के अकेले रहने के राज को देखा मैंने,

ये समुद्र का शोर इंसानों के शोर से अच्छा है,

छोटी सी चिड़िया के कई घावों को देखा मैंने,

रात को एक अजब ख्वाब देखा मैंने।

ठीक है तुम बना लो अपना घर यहाँ,

चट्टान की हल्की सी मुस्कान को देखा मैंने,

मैं तुम्हारे साथ रहूंगी हमेसा,

छोटी सी चिड़िया के वादे को देखा मैंने,

सूरज, समुद्र, इंसान सब हार गए थे,

विस्वास और दोस्ती को जीतते देखा मैंने,

रात को एक अजब ख्वाब देखा मैंने।

वापसी……

हरे पेड़ो की तरह लौटेंगे विश्वास,

गुलाबी फूलो की तरह मुस्कान,

बच्चे की किलकारियों सी लौटेगी ऊर्जा,

बुजुर्ग अनुभवों सी आस्थाये लौटेंगी,

एक दिन देखना सब कुछ लौटेगा।

जो भी किये मैंने भले काम,

वो उत्साह बनकर लौटेंगे,

आशीर्वाद जो बटोरे जीवन में,

वो सब सहारा बनकर लौटेंगे,

जितने भी समेटे मैंने आंसू,

वो मुस्कान बनकर लौटेंगे,

एक दिन देखना सब कुछ लौटेगा।

लौटेगी खोई हुई सूझ,

भटके विचार, बिखरे मूल्य लौटेंगे,

लौटेगी खोई हुई हिम्मत,

भटके रास्ते, बिखरी आशाएं लौटेंगी,

एक दिन देखना सब कुछ लौटेगा।

बस चलती चलु लगातार,

बोलती चलू अपने शब्द,

अपने कर्मो के हाथों से,

साधना की शहनाई बजाऊ,

एक दिन सब रूठे हुए दिन लौटेंगे,

एक दिन देखना सब कुछ लौटेगा।

बिना शीशे की बस….

ना जाने लोग स्वर्ग को क्यों तलाशते है, अभी बाकी दुनिया तो नहीं उसने नहीं देखी थी, पर इण्डिया में ही काफी स्वर्ग ढूंढ लिए है उसने, उन्ही में से एक बहुत ही सुन्दर जगह है मुनार। मुनार एक हिल स्टेसन है जो तमिलनाडु और केरला के बॉर्डर के पास है। बादलो और खूबसूरती से ढका हुआ। अपने आप में ही एक पूरी दुनिया को समेटे हुए। वैसे तो काफी किस्से है इस यात्रा के पर एक किस्सा सबसे यादगार किस्सा है उसका।

दी इस बस में नहीं चलेंगे अपन, ये बहुत खटारा बस है। पिया ने बस को देखते हुए कहा। ये मुनार से निकलने का वक़्त था उनकी ट्रिप का। पर पिया अगली बस 3 घंटे बाद है, और अपने लेट हो जायेंगे कोच्चि के लिए। ये सब मुझे नहीं पता , पर मैं इस बस में नहीं बैठूंगी। एक 24 साल की समजदार लड़की कैसे बच्चो सी जिद्द कर रही थी, और वो भी बस , बस की शक्ल देखकर। या कही कुछ और था उसके दिमाग में, हा सही, कुछ और ही चल रहा था उसके दिमाग में। उसे अभी वहां से नहीं जाना था अभी, पहाड़ो में जान बस्ती थी उसकी, ये जंगल पसंद थे उसे, कितने सुन्दर खिले फूल, कितने ऊँचे ऊँचे पेड़, और कई 100 सालों पुराने चाय के बागान। कैसे मन को समझाये वो यहाँ से जाने के लिए। उसे नहीं पता केरला में क्या नया देखने को मिलने वाला है उसे, बस अभी तो उसे यही रुकना था, यही असली ज़िन्दगी में।

चलो चढ़ो बस में, एक गुस्से के आवाज के साथ सारी कल्पनाएं बिखर गई। खुद का बैग उठाकर भी नहीं रखा बस में। और ना साथ वालो के साथ सीट पे बैठी। पर बस की खिड़की के पास रूठकर बैठ गयी। थोड़ी देर बाद सीधी आती हवा तेज तरीके से चेहरे पे आ रही थी। ये सीसे में से भी इतनी तेज हवा क्यों आ रही है, समझ नहीं आ रहा था उसे, क्या मेरी खिड़की का सीसा टुटा हुआ है, और हो भी क्या सकता है , बिठाया ही ऐसी खटारा बस में है। उसने हाथ लगाकर देखा खिड़की में शीशा नहीं था। मुझे इस सीट पे नहीं बैठना यहाँ तो शीशा भी नहीं है, मुह बनाते हुए पिया ने कहा, अरे शीशा तो यहाँ भी नहीं है दी ने चेक करते हुए कहा। है… ये तो पूरी बस में ही शीशे नहीं है। बस और क्या चाहिए था पिया को, कहा था मैंने इस खटारा बस में मत बैठो, पर मेरी सुनता कोन है, बिना शीशे की बस में बिठा दिया मुझे। चलो उस वक्त तो वो नहीं जीत पाई थी पर अब मौका था सारी खुन्नस निकलने का, 3 घंटे वहां रुक नहीं सकते थे, कम से कम शीशे वाली बस में तो आते। तभी पास से एक दूसरी बस गूजरी उसमे भी शीशे नहीं थे। अरे भईया ये आपकी बस में शीशे क्यों नहीं है, उसने कंडक्टर से पूछ ही लिया। मैडम शीशो से बहुत हुमिनिटी हो जाती है बस में यहाँ। और घुटन होती है, इसलिए ये pvc ट्यूब लगती है खिड़की बंद करने के लिए , आप चाहे तो खिड़की बंद कर ले। आप शायद नार्थ से है इसलिए आपको नहीं पता।

अब पिया का चेहरा देखने लायक था, बस चुपचाप फ्रूटी पिने, और खूबसूरत रास्ता देखने के आलावा कोई और बोलने का ऑप्शन नहीं था। पीछे से हँसने की आवाज आ रही थी, और जानती थी वो उसी की हँसी उड़ाई जा रही है, पर कोई ना केरल यहाँ से भी ज्यादा खूबसूरत है।……..

वो कांच की गोलियाँ…..

वो हरे रंग की छोटी छोटी कांच की गोलियाँ,

कहने को वो कांच की थी,

पर शायद कितने ही दिलो की धड़कन थी,

खनखनाहट में हँसी समेटे थी वो कांच की गोलियां।

कहने को वो हरे रंग की थी,

पर शायद कितने ही सतरंगी सपनो सी थी,

कई आशाओं को समेटे थी वो कांच की गोलियां।

कहने को वो गिनती की थी,

पर शायद कितने ही अनगिनत लम्हो सी थी,

कई अरमानो को समेटे थी वो कांच की गोलियां।

कहने को तो बस निशाना लगाना था,

पर शायद कितने ही लक्ष्यों की पहचान सी थी,

कई रास्तो को समेटे थी वो कांच की गोलियां।

कहने को तो बस हरी गोलियां थी,

पर शायद कितने ही दोस्तों की मस्ती सी थी,

कई अनगिनत यादों को समेटे थी वो कांच की गोलियां

वो हरे रंग की छोटी छोटी कांच की गोलियां।

Ziddi zindagi ……..7

तुम मेरे बिना कभी खुश नहीं रह पाओगी। उसकी ज़िन्दगी में कितने ही लोग ये बात कह गए थे। शायद गिनती भी याद नहीं है उसे तो अब। पर क्या सच में ऐसा है। बहुत कोशिस करती है वो ऐसे हकीकत में अप्लाई करने की, की कोई तो हो जिसकी ये बात सच हो।

पर सही मायनों में उसका छोटा सा दिमाग और शायद बहुत बड़ा सा दिल तो उसे यही समझाते है कि, उसकी ख़ुशी बस उसमे ही है। सब मुस्कराहटें बस उसमे छुपी हुई है। और सही ही तो है वो डूबते सूरज को देखकर ही खुश है, मिट्टि में नंगे पांव चलकर ही खुश है, दिन में कितनी ही छोटी छोटी बाते है जिन्हें करकर खुश है। खुश है वो अपने सपनो की दुनिया में, खुश है वो किसी की मुस्कराहट देखकर, जब अपनी ही बनाई दुनियां को सच होते हुए देखती है तो खुश है वो।

फिर ये गलतफहमी क्यों है दुनिया में की वो लड़की है तो उसे खुश रहने के लिए कोई और वजह चाहिए। जिसकी एक मुस्कराहट से नई ज़िन्दगी भी जीती है, कोई कैसे वजह बन सकता है उसकी खुशि की। वो तो खुद में एक सितारे सी चमकती है, कोई कैसे उसकी चांदनी को रास्ता दिखा सकता है।

ये तो उसके छोटे से दिमाग से समझ के बाहर है कि लोग उसकी ख़ुशी की वजह है या वो उन झूठी गलतफमी रखने वालों का सहारा है। जो उसकी एक मुस्कराहट को सहन तक नहीं कर सकते, कैसे वो उसकी खुशियो की वजहा बन सकते है।अब बहुत समझकर उन खुशियो की वजह लोगो के लिए बस एक ही जगहा रखी है,

तुम मुस्करा सकते हो अगर मेरे साथ,

तो इस खिलती दुनिया में स्वागत है,

और अगर कोशिस की कभी वजह बनने की,

चाहे ख़ुशी या आंसुओ की,

तो इस वजह के कोई जगह नहीं है।………

कुछ वक़्त के लिए…………

खुद को खोकर कुछ वक्त के लिए,

खुद को मैंने ढूंढ लिया है।

हँसी को खोकर कुछ वक्त के लिए,

मुस्कराहट को मैंने ढूंढ लिया है।

ज़िन्दगी में रोना रोती रही हमेशा,

मैंने ज़िन्दगी में ये खो दिया,

ज़िन्दगी को खोकर कुछ वक़्त के लिए,

ज़िन्दगी को जीना मैंने सिख लिया है।

बड़ी शिकायते रही मुझे आंसुओ से हमेशा,

कितने ही अनमोल मोती बहा दिए,

आंसुओ में जीकर कुछ वक़्त के लिए,

वक़्त को जितना मैंने सिख लिया है।

लोगो से करती रही शिकायते मैं हमेशा,

कितने ही लोगो को खो दिया,

अकेले रहकर मैंने कुछ वक़्त के लिए,

लोगो में जीना मैंने सिख लिया है।

बांधकर रखा लम्हो को मैंने हमेशा,

बंधन में कितने ही लम्हे गवा दिए,

आजादी में रहकर मैंने कुछ वक़्त के लिए,

पानी सा बहना मैंने सिख लिया है।

यादों को बांधकर रखा शब्दो में हमेशा,

कितनी ही यादों को भुला दिया,

शब्दो में जीकर कुछ वक्त के लिए,

शब्दों में हँसना मैंने सिख लिया है।

खुद को खोकर कुछ वक़्त के लिए,

खुद को मैंने ढूंढ लिया है।

स्वाभिमान…….

पी जा हर अपमान और कुछ चारा भी तो नहीं,

तूने स्वभिमान से जीना चाहा यही गलत था,

कहा पक्ष में तेरे किसी समझ वाले का मत था,

केवल तेरे ही अंधरो पे कड़वा स्वाद नहीं है,

सबकी आशाएं टूटी है तू अपवाद नहीं है।

तेरा असफल हो जाना तो पहले से ही तय था,

तूने कोई समझौता स्वीकारा भी तो नहीं,

माथे से हर शिकन पोंछ दे आँखों से हर आंसू,

पूरी बाजी देख अभी तू हारी भी तो नहीं ।

सुन ले अभी सारे बोल तू और कोई चारा भी तो नहीं,

तुझे तो लोगो की नज़र में खटकना ही था,

तूने कभी आवाज को दबाया भी तो नहीं,

चल ले अभी काँटों पर और कोई रास्ता भी तो नहीं,

तेरे पावो का छलनी होना तो पहले से तय था,

तूने कभी कदम पीछे हटाये भी तो नहीं।

अकेले……

वो सवाल जिनके बारे में,

मैं कुछ नहीं जानती,

क्यों बार बार मेरे सामने खड़े हो जाते है।

मुझे उतनी हवा काफी है,

जितना मेरा सांसो का वजन,

फिर क्यों ये आंधी के बवंडर खड़े हो जाते है।

खुद को बचाने के लिए,

मेरे इर्द- गिर्द मेरी ही परछाई है,

फिर क्यों ये बंधन खड़े हो जाते है।

चौखट के पास पसरे हाथ जकड गये है,

मैं कोशिस तो पूरी करुँगी,

उन पत्थरो से लड़ने की,

जिनका जाल बिछा है मेरे चारो और,

वरना ये तय रहा,

मेरा चेहरा भी एक पत्थर होने वाला है।

ये हवाएं बेसब्र है जानने के लिए,

की जिस्म से अलहदा कुछ सांसे कहा से आ रही है,

जब कुछ ऐसा होता है मेरे आस पास की,

हवा के भी आंसू निकल आये,

और दरिया भी रोने लगे,

मुझे कुछ नहीं होता है,

लौट जाती हूं मैं अपने भीतर खामोश,

म नहीं चाहती कोई भी हाथ पकड़कर,

दे मुझे झूठी तस्सली,

हर जगहा पहुचना चाहती हु अकेले,

अपने सच के छोटे छोटे टुकड़ों के साथ।

कहानी तेरी मेरी सी…..10

मंदिर का पण्डित….

मुझे आज कॉफ़ी पीनी है, पिया ने अपनी डिमांड रख दी थी। अबे पागल कल पेपर है, पढ़ ले थोड़ा बहुत नहीं तो तू पास नहीं होने वाली इस बार, अवि ने समझाते हुए कहा। सही तो कह रहा था अवि, जो लड़की सारे सेम में नहीं पढ़ती,और एग्जाम में भी मूवी देखती है, कैसे पास हो जाती है वो सारे एग्जाम्स में। पिया पे ये डाउट सबको था। और ये तो पिया भी नहीं जानती थी , वो कैसे पास हो जाती थी बस रात को दोस्तों से सुनती थी और सुबह उसे यो का यो एग्जाम शीट में छाप आती थी। भगवान् से आज भी उन दोस्तों के भले की दुआ मांगती है जो पेपर से पहली रात को उसे पढ़ा दिया करते थे। शायद हॉस्टल की अनगिनत यादो में से ये सबसे प्यारी याद है पिया की।

अरे कहा खो गयी लड़की तू कभी टाइम पे जवाब नहीं देती, पता नहीं कहा गायब हो जाती है, अवि ने झुंझलाते हुए कहा। मैं रात को पढ़ लुंगी, और तू बोलेगा तो तूझे भी पढ़ा दूंगी। बस यही एक टैलेंट था पिया में, वो दुसरो को समझाने में माहिर थी। बस अभी गोदावरी जाना है और कॉफ़ी पीनी है। अगर पिया को कॉफ़ी पीनी है और कोई उसे मना कर दे और वो भी उसका बेस्ट फ्रेंड इससे बड़ा गुनहा कोई नहीं हो सकता था अवि के लिए। पिया की ज़िन्दगि का सबसे बड़ा लालच कॉफ़ी ही है।

तू आ रहा है या नहीं, ये कोई पूछना नहीं था, एक धमखी थी की आना ही है, यही तो हक़ होता है दोस्तों पे। पानी के किनारे बैठी वो अवि और सिद्धार्थ का इंतज़ार कर रही थी। यही एक जगह थी जो उस अनजाने शहर में सबसे ज्यादा पसंद थी पिया को। अवि पहुच गया थोड़ी देर बाद, और दोनों सिद्धार्थ का इंतज़ार करने लगे, की वो आये तो कॉफ़ी पिने चले। पर इंतज़ार कब झगड़े में बदल गया उन्हें पता ही नहीं चला बस यही तो एक काम आता था दोनों को, कभी खत्म ना होने वाला झगड़ा। कब दोनों की चिल्हाट में एक तीसरी चिलाहट आने लगी उन्हें धीरे धीरे पता लग रहा था। ये चिल्लाने की आवाज मंदिर के पंडित की थी, और एक बात और थी जो उन्हें नहीं पता थी, वहां नदी किनारे एक लड़का और लड़की नहीं बैठ सकते थे। तुम लोगो ने हमारी सभ्यता बिगाड़ रखी है, थोड़ी बहुत भी शर्म नहीं है तुम लोगो में, भगवान् का घर भी नहीं छोड़ते हो, एक पे एक डायलॉग मिल रहे थे दोनों को, कही गुस्सा जागने लगा था दोनों में, पर पता नहीं दोनों नालायको में गुस्से की जगह संस्कार कैसे भारी पड़ गए, बस पंडित का मुँह देखते रहे , और बिना बहस किये उनसे माफ़ी मांगकर बाहर आ गए दोनों। और शायद सही भी किया, क्योकि वो सबको अपनी दोस्ती नहीं समझा सकते थे, जिस समाज में दोस्त की परिभासा ही नहीं, बस लड़के और लड़की के दो ही रिस्ते परिभाषित है, एक बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड, और दूसरा भाई बहन, वहां क्या बहस करे वो किसी से। कैसे समझाए किसी को की रिश्तो की परिभासा नहीं होती वो तो बस एक दूसरे को जोड़ने के माध्यम है बस, कैसे समझाए किसी को, उनका रिश्ता क्या है, बस वो दोनों तो बेस्ट फ्रेंड है………

रंग…..

कहा से शुरू कर तुझे तेरी कहानी में,

कितने ही रंग बिखेरे है तूने मेरी ज़िन्दगानी में।

एक रंग पागलपन का है इस कहानी में,

जिसने और भी खूबसूरती भर दी है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग सपनो का है इस कहानी में,

जिसने जीने के मकसद दिए है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग विस्वास का है इस कहानी में,

जिसने तेरे जैसा दोस्त दिया है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग साथ का है इस कहानी में,

जिसने रास्ते नापने सिखाये है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग बोल्डनेस का है इस कहानी में,

जिसने फैसले लेना सीखा दिया है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग खूबसूरती का है इस कहानी में,

जिसने एक नजरिया दिया है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग मस्ती का है इस कहानी में,

जिसने वक्त का साथ दिया है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग उपहार का है इस कहानी में,

जो तूने मुझे दिया है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग जिदद का है इस कहानी में,

जिसने दुनिया से अलग बनाया है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग होशियारी का है इस कहानी में,

जिसने मुझे तेज बनाया है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग सादगी का है इस कहानी में,

जिसने महसूस करना सिखया है इस ज़िन्दगानी में।

एक रंग तेरा है दोस्त इस कहानी में,

जिसने मुझे मुझसे मिलाया है इस ज़िन्दगानी में।

देख कितने सारे रंग बिखेरे है तूने मेरी ज़िन्दगानी में।

ज़िन्दगी……

ज़िन्दगी एक बहुत ही खूबसूरत एहसास है,

जैसे छुईमुई को छूने से वो अपनी स्थिति बदलती है,

जैसे ज़िन्दगी को जीते है वो अपने रंग बदलती है।

एक पल को इतनी मुश्किल हो जाती है,

और दूसरे ही पल इतनी लचीली हो जाती है।

कभी गर्म आग बनकर दहक जाती है,

और कभी पानी के जैसे शांत बनकर बह जाती है।

कभी इतने तूफान खड़े कर देती है,

और कभी शांत हवा के जैसे चलती है।

कभी इतना वक्त भी नहीं की साँस ले सके,

और कभी इतना जो काटे भी नहीं कट सके।

कभी अनजाने रास्तो में भी पहचान बना लेती है,

और कभी पहचान में भी वजूद खो देती है।

सच जिन्दगी एक बहुत खूबसूरत एहसास है।

दोस्त……

बचाकर रखना ,

चाहती हूँ मैं,

तुम्हे और तुम्हारा प्यार,

अपनत्व और स्नहे,

जैसे बचाकर रखती है माँ,

अपने आंसू,

बुरे वक्त के लिए।

आधुनिकता के इस जंगल में,

बचाना चाहती हूँ,

विरासत का बूढ़ा पेड़,

सांसे लेने के लिए।

उगाना चाहती हूँ,

आशाओं के फूल,

यादों की गहरी घाटियों में,

धुन्धलाते लोकगीतों की तरह ,

सहेजना चाहती हूँ,

अपना साथ,

जैसे बचाकर रखता है किसान,

मुट्ठी भर अनाज,

अगली फसल के लिए।

नफरतो के इस दौर में,

बचाना चाहती हूँ मैं अमन,

आने वाली पीढ़ियों के लिए।

जैसे खिलाफ हवा के,

हथेली की ओट से,

बचाई जाती है,

दिए की लौ,

अंधरे में उजाले के लिए।

बचाकर रखना चाहती हूँ,

दोस्त।

कहाँ…….

” मैंने गलती से वक्त से,

वापस बचपन मांग लिया,

वक़्त भी रो दिया कुछ आंसू,

अब मैं इतना खूबसूरत कहा।

मैंने गलती से गलियों से,

वापस पुराने दिन मांग लिए,

गलियां भी हो गयी उदास,

अब हम इतनी आबाद कहा।

मैंने गलती से पेड़ से,

वापस झूला मांग लिया,

पेड़ भी सहम कर चुप हो गया,

अब मैं इतना मजबूत कहा।

मैंने गलती से तालाब से,

वापस कागज की कश्ती मांग ली,

वो भी घुल गया मिटटी के साथ,

अब मैं इतना लायक कहा।

मैंने गलती से रात से,

वापस मांग ली कुछ कहानियां,

रात भी अँधेरे में छुप गई,

अब मैं वो उजली चांदनी कहा।

मैंने गलती से गर्मियों से,

वापस मांग ली दोपहर,

गर्मी भी उबल गयी कुछ खुद में,

अब मैं वो ठंडी छाछ कहा।………..

Ziddi Zindagi……6

तुम लड़की हो, और लड़की को हमेशा किसी सहारे की जरूरत पड़ती ही है, इसलिए अगर ज़िन्दगी सही तरीके से जीनी है तो अपना एटीट्यूड बदल लो। इस एटीट्यूड के साथ कभी खुश नहीं रह पाओगी ।

कोनसी ख़ुशी, वो तो ख़ुशी का मतलब ही नहीं समझ पाती थी, और कोनसे सहारे। वो सहारे जो उसपर अपना हक जाताना जानते थे बस। वो सहारे जो अपना चेहरा बदलते थे हर मोड़ पे बस। कैसे सहारे बन सकते है , वो उसके जो खुद उसके सहारे चलते है। एक तरफ वही सहारा उसे डुबोता है, और दूसरी और वही सहारा उसे फिर ऊपर उठने का एहसास कराता है। वही सहारा उसे पीछे चलने का आदेश देता है, और वही सहारा फिर साथ चलने का ढोंग करता है। नहीं चाहिए उसे वो सहारे जो….

* सिर्फ हक़ जाताना जानते है,

* सिर्फ उसे ये एहसास कराना जानते है, वो कमजोर है,

* जो उसकी परिभासा तय करते है,

नहीं चाहिए उसे ये सहारे, वो कोई बेल नहीं है, वो तो वो पेड़ है जो खुद में सारी दुनिया समेटे हुए है।

और रही बात एटीट्यूड की, तो वो उसकी अपनी पहचान है, और अगर किसी को उससे तकलीफ हो तो वो अपना एटीट्यूड बदल ले ना की उसे बदलने को कहे। हाँ यही हिसाब है उसकी जिंदगी का, अभी तो बस आवाज और नजर उठी है, अगर गलती से कभी आत्मसम्मान को ठेस पहुची तो शायद सारे सहारो का एटीट्यूड बदल जायेगा।

तू ही है तेरी नोका,

तू खुद है तेरी पतवार,

तू ही है तेरा सहारा,

तू खुद ही तेरी तलवार है।

वजूद…….

” जब चुन लिया आशा को,

तो निराशा का वजूद ही क्या,

जब चुन लिया रौशनी को,

तो अंधरो का वजूद ही क्या,

जब चुन लिया मुस्कराहट को,

तो आंसुओ का वजूद ही क्या,

जब चुन लिया हिम्मत को,

तो डर का वजूद ही क्या,

जब चुन लिया जिदद को,

तो हार का वजूद ही क्या,

जब चुन लिया विस्वास को,

तो शंका का वजूद ही क्या,

जब चुन लिया रास्तो को,

तो मंजिल का वजूद ही क्या,

जब चुन लिया ज़िन्दगी को,

तो मौत का वजूद ही क्या।”

शब्द और एहसास……..

” कुछ खामोशियो को लिख रही हूँ,

कुछ उदासियों को लिख रही हूँ,

शब्दो के साथ कुछ एहसास लिख रही हूँ।

कुछ खिलती हँसी को लिख रही हूँ,

कुछ खुशियो को लिख रही हूँ,

शब्दो के साथ कुछ एहसास लिख रही हूँ।

कुछ सपनो को लिख रही हूँ,

कुछ ख्वाहिशो को लिख रही हूँ,

शब्दो के साथ कुछ एहसास लिख रही हूँ।

कुछ बीता बचपन लिख रही हूँ,

कुछ जवानी के सबक लिख रही हूँ,

शब्दो के साथ कुछ एहसास लिख रही हूँ।

कुछ दोस्ती की कहानी लिख रही हूँ,

कुछ ज़िन्दगी की जिदद लिख रही हूँ,

शब्दो के साथ कुछ एहसास लिख रही हूँ।

गुजरता वक़्त…….

“शाम गुजर रही है,
खुद को खुद से मिलाने में।
सुबह गुजर रही है,
ज़िन्दगी से रफ़्तार मिलाने में।
दिन गुजर रहे है,
आने वाले दिनों को मिलाने में।
पल गुजर रहे है,
पीछे और आगे के पलों को मिलाने में।
और ज़िन्दगी गुजर रही है,
देखो ज़िन्दगी को मिलाने में।”